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काल-सर्प योग इसके परिणाम और इससे बचने के उपाय

ज्योतिष एक अनुसन्धानात्मक विज्ञान है जिसमे समय समय पर अनुसन्धान होने ही चाहियें और ऐसे ही ज्योतिषीय अनुसंधानों से सामने आया काल-सर्प योग। काल-सर्प योग ज्योतिष में एक बहुचर्चित विषय है जिसे लेकर लोगो के मन में एक भय भी बना रहता है क्योंकि इस योग को बहुत दुष्परिणाम देने वाला बताया गया है तो आईये जानते हैं क्या होता है काल-सर्प योग यह किन किन परिस्थितियों में बनता है और इसके क्या परिणाम होते हैं

" काल-सर्प योग कुंडली में राहु और केतु की एक विशेष स्थिति से बनने वाला योग है। यह बात तो हम जानते ही हैं के राहु और केतु हमेशा समसप्तक रहते हैं अर्थात हमेशा एक दुसरे के सामने (180 डिग्री पर) रहते हैं। जब कुंडली में सभी ग्रह राहु केतु के अक्ष के एक और आ जाते हैं तो इसे कालसर्प योग कहते हैं जिसमे कालसर्प योग की भी विशेषतः दो स्थितियां और बारह प्रकार होते हैं "

काल-सर्प योग की स्थितियां -
काल-सर्प योग में दो स्थितियां बनती हैं 1) उदित गोलार्द्ध। 2) अनुदित गोलार्द्ध।

1. कालसर्प योग बनने पर जब सभी ग्रह राहु की और आगे बढ़ रहे हो तो इसे उदित गोलार्द्ध कहते हैं।

2. कालसर्प योग बनने पर जब सभी ग्रह केतु की और आगे बढ़ रहे हों तो इसे अनुदित कालसर्प योग कहते हैं।

उदित गोलार्द्ध की स्थिति को अधिक समस्या कारक माना गया है क्योंकि इसमें सभी ग्रह राहु की और बढ़ते हैं और राहु सर्प का मुख है जो ग्रहों को ग्रसने के लिए वक्री गति से उनकी और बढ़ता है।

कालसर्प योग के प्रकार -

कुंडली के बारह भावों में राहु केतु की भिन्न भिन्न स्थितियों से बारह काल सर्प योग निर्मित होते हैं -
अनन्त, कुलिक, वासुकि, शंखपाल, पद्म, महापद्म, तक्षक, कर्कोटक, शंखनाद, पातक, विषाक्त और शेषनाग।

अनन्त - कालसर्प योग में जब राहु लग्न में और केतु सप्तम भाव में हो तो इसे अनन्त कालसर्प योग कहते हैं।

कुलिक - कालसर्प योग में जब राहु दूसरे और केतु आठवें भाव में हो तो इसे कुलिक कालसर्प योग कहते हैं।

वासुकि - जब राहु तीसरे भाव में और केतु नवम भाव में हो तो इसे वासुकि कालसर्प योग कहते हैं।

शंखपाल - जब राहु चतुर्थ भाव में और केतु दशम भाव में हो तो इसे शंखपाल कालसर्प योग कहते हैं।

पद्म - राहु पंचम भाव और केतु एकादश भाव में हो तो पद्म कालसर्प योग बनता है।

महापद्म - जब राहु छटे भाव और केतु बारहवे भाव में हो तो इसे महापद्म कालसर्प योग कहते हैं।

तक्षक - राहु सप्तम भाव में और केतु लग्न में हो तो इसे तक्षक कालसर्प योग कहते हैं।

कर्कोटक - राहु आठवें भाव में भाव में और केतु दूसरे भाव में हो तो कर्कोटक कालसर्प योग बनता है।

शंखनाद - राहु नवम भाव में और केतु तीसरे भाव में हो तो शंखनाद कालसर्प योग बनता है।

पातक - जब राहु दशम भाव और केतु चतुर्थ भाव में हो तो इसे पातक कालसर्प योग कहते हैं।

विषाक्त - राहु ग्यारहवे भाव में और केतु पांचवे भाव में हो तो इसे विषाक्त कालसर्प योग कहते हैं।

शेषनाग - जब राहु बारहवे भाव में और केतु छटे भाव में हो तो इसे शेषनाग कालसर्प योग कहते हैं।

काल-सर्प योग के परिणाम -

कालसर्प योग को एक संघर्ष कारक योग माना गया है यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में कालसर्प योग बन रहा हो तो उसे अपने जीवन में बहुत संघर्ष करना पड़ता है, परिश्रम करने पर भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाते, भाग्योदय बहुत विलम्ब से होता है और ऐसे व्यक्ति कार्यों में बाधायें बहुत आती हैं। ज्योतिषीय अनुसंधानों और व्यवहारिक दृष्टिकोण से भी यह देखा गया है के कालसर्प योग होने पर व्यक्ति को बहुत संघर्ष का सामना करना पड़ता है। और कालसर्पयोग बनने पर राहु केतु कुंडली के जिन दो भावो में होते हैं उन भावों से सम्बंधित समस्यायें व्यक्ति को अधिक परेशान करती हैं।

विशेष - ज्योतिष में यदि हम व्यवहारिक रूप से अर्थात प्रैक्टिकली देखें तो जन्मकुंडली विश्लेषण में कभी भी किसी एक बात या तथ्य के आधार पर ही परिणाम नहीं निकाला जाता विभिन्न योग और कुंडली की सभी ग्रहस्थितियों को मिलाकर ही पूर्ण फलित किया जाता है, कुंडली में कालसर्प योग की उपस्थिति व्यक्ति के जीवन में संघर्ष तो बढ़ाती है परन्तु ऐसा नहीं है के कालसर्प योग होने से व्यक्ति के जीवन का सम्पूर्ण विकास ही रुक जाये, कालसर्प योग कुंडली में उपस्थिति होने पर भी यदि अन्य ग्रह स्थिति मजबूत हो ग्रह स्व उच्च राशि में हों या अन्य शुभ योग भी बने हुए हों तो कालसर्प योग होने पर भी व्यक्ति को अच्छी उन्नति मिल सकती है। कालसर्प योग का दुष्परिणाम अधिक तभी होता है जब अन्य सभी ग्रह भी कमजोर या पीड़ित हों अतः कालसर्पयोग के परिणाम के लिए अन्य ग्रहस्थिति का विश्लेषण करना भी बहुत आवश्यक होता है।

कालसर्प योग के उपाय -

कालसर्पयोग की शांति के लिए जो वैदिक अनुष्ठान, पूजा आदि करायी जाती हैं वह तो उत्तम उपाय है ही परन्तु हम यहाँ कुछ सरल और सहज उपाय बता रहे हैं जो कालसर्प योग के नकारात्मक परिणाम से बचने में सहायक होते हैं।

1. राहु-केतु के मंत्र का नित्य जाप करें -
ॐ राम राहवे नमः
ॐ केम केतवे नमः

2. शिवलिंग का नित्य अभिषेक करें।

3. पक्षियों और कुत्तो को रोज भोजन दें।

4. माह में एक बार सतनजा किसी गरीब व्यक्ति को दान करें।

5. महामृत्युंजय मंत्र का सामर्थ्यानुसार रोज जाप करें।

।।श्री हनुमते नमः।।


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