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जानिए क्या होते हैं मूल नक्षत्र

मूल नक्षत्र शब्द से हम सब परिचित हैं किसी बच्चे का जन्म होने पर उसकी जन्मपत्री निर्माण करने के बाद ब्राह्मणो या ज्योतिषी द्वारा बतायी जाने वाली मुख्य जानकारियों में से ये सबसे अहम बात होती है के बच्चे का जन्म किस नक्षत्र में हुआ है विशेष रूप से मूल नक्षत्रों में बच्चे के जन्म को लेकर सभी चिंतित रहते हैं और मूल नक्षत्रों में बच्चे के जन्म को कष्टकारी भी माना गया है तो कौनसे नक्षत्र मूल नक्षत्रों में आते हैं और क्यों इनमे बच्चे का जन्म क्यों अच्छा नहीं माना गया आइये जानते हैं –

मूल नक्षत्रों की उत्पत्ति -

वर्तमान समय में ज्योतिषीय गणनाओं में राशियों का अधिक महत्व हो गया है परन्तु प्राचीन समय में भारतीय ज्योतिष पूर्णतः केवल नक्षत्रों पर ही आधारित थी, हमारे प्राचीन ऋषियों ने हमारे सौरमंडल को अट्ठाईस समान भागों में बाटा था और आकाश के इन्ही अट्ठाइस भागों को ही नक्षत्र की संज्ञा दी गई थी और इन्हे अश्वनी, भरणी, कृतिका, रोहिणी से रेवती तक नाम दे दिए गये। (वास्तव में आकाश में दिखाई देने वाले तारों के समूह ही नक्षत्र होते हैं) कालांतर में जब बारह राशियों की खोज हुई तो हमें बारह राशि और अट्ठाईस नक्षत्रों को आपस में समायोजित करना था परन्तु अट्ठाईस नक्षत्रों को बारह जगह पूरा विभाजित करना सम्भव नहीं है इसके अतिरिक्त एक नक्षत्र में चार चरण या भाग होते हैं अतः अट्ठाईस नक्षत्रों के कुल 112 चरण हुए परन्तु 112 चरणों को भी बारह राशियों में पूरी तरह विभाजित नहीं किया जा सकता इसलिए निर्णय लिया गया के 28 नक्षत्रों में से अभिजीत नक्षत्र को ज्योतिषीय गणना में से हटा दिया जाय, ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि अभिजीत नक्षत्र राशि पथ से बहुत दूर था तो अब कुल 27 नक्षत्र और इनके कुल चरण 108 हुए अब इन 27 नक्षत्रों के 108 चरणों को 9 - 9 के हिसाब से बारह राशियों में बाट दिया गया जिससे एक राशि में 9 चरण और सवा दो नक्षत्र आये इसके लिए एक व्यवस्था बनायीं गई जिसमे बारह राशियों को 4 - 4 के हिसाब से तीन युग्मों में बाटा गया और इन युग्मों को त्रित्यांश की संज्ञा दी गई पहले त्रित्यांश में मेष से कर्क तक चार राशि आयीं दूसरे त्रित्यांश में सिंह से वृश्चिक तक और तीसरे में धनु से मीन तक अंतिम चार राशियाँ आयीं यहीं से मूल नक्षत्रों की उत्पत्ति हुई –

त्रित्यांश चक्र - अश्वनी-1 2 3 4-अश्लेषा + मघा-5 6 7 8-ज्येष्ठ + मूल-9 10 11 12-रेवती
1st 2nd 3rd

उपरोक्त के अनुसार प्रत्येक त्रित्यांश में चार राशि, नौ नक्षत्र और छत्तीस चरण आये इन त्रित्यांशों की संधि जिन नक्षत्रों से होती है उन नक्षत्रों को ही मूल नक्षत्र कहते हैं पहले और दूसरे त्रित्यांश की संधि अश्लेषा और मघा नक्षत्र से होती है दूसरे और तीसरे त्रित्यांश की संधि ज्येष्ठ और मूल नक्षत्र से होती है तथा तीसरे और पहले त्रित्यांश की संधि रेवती और अश्वनी नक्षत्र से होती है

अतः त्रित्यांशों की संधि पर पड़ने वाले नक्षत्र ही मूल नक्षत्र हैं जो छः होते हैं - अश्वनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठ, मूल रेवती इन छः नक्षत्रों को ही मूल या गण्ड-मूल कहते हैं। दुसरे शब्दों में ये भी कह सकते हैं के कर्क-सिंह, वृश्चिक-धनु तथा मीन और मेष राशि की संधि जिन नक्षत्रों से होती है वे ही मूल नक्षत्र कहे गये हैं

“मूल नक्षत्रों में जन्म होना अच्छा नहीं माना गया है इसके पीछे भी यह कारण है के संधि काल को शुभ नहीं माना गया है संधि काल एक प्रकार का संक्रमण काल होता है जो सदैव कष्टदायक, समस्यकारक और असमंजसपूर्ण समय होता है उधारण के रूप में जब ऋतुओं की संधि होती है तब बिमारियां अधिक फैलती हैं दो मार्गों की संधि पर सावधानी सूचना पट्ट लगे होते हैं क्योंटी वहां अधिक दुर्घटनाएं होती हैं शाशन के संधि काल में जनता को कष्ट होते हैं और वरदान प्राप्त करने के बाद भी हिरण्यकश्यप का जिस प्रकार अंत हुआ वह भी संधि काल का ही उदाहरण है अतः मूल नक्षत्रों में जन्मे बच्चों पर इसका नकारात्मक प्रभाव तो अवश्य पड़ता है विशेष रूप से जन्म से ही बालक को स्वास्थ सम्बन्धी समस्याओं का सामना करना पड़ता है और अन्य भी विभिन्न प्रकार से संघर्ष उत्पन्न होते हैं इसी लिए मूल नक्षत्रों में जन्मे बच्चे के जन्म के बाद मूल शांति के लिए विशेष पूजा करायी जाती है जिसमे मूल नक्षत्र में शांति मंत्र के निश्चित मात्रा में जाप कराये जाते हैं जिससे मूल नक्षत्रों का दुष्प्रभाव कम हो जाता है”

विशेष - मूल नक्षत्र संक्रमण काल होने से इसे नकारात्मक समय तो माना गया है परन्तु मूल नक्षत्र में बच्चे के जन्म को लेकर इतना भयभीत नहीं होना चाहिए इसमें भी एक विशेष बात है वैसे तो एक नक्षत्र पूरे दिन विद्यमान होता है अतः किसी दिन मूल नक्षत्र होने पर उस दिन जन्मे सभी बच्चे मूल में माने जायेंगे परन्तु जिस समय मूल नक्षत्रों की संधि होती है उस सटीक समय के आस पास का समय-काल ही अधिक कष्टकारी होता है इसे गणांत-मूल कहते हैं अतः मूल नक्षत्रों में भी केवल संधि काल (गणांत मूल) को ही अधिक दुष्परिणाम देने वाला माना गया है।

।।श्री हनुमते नमः।।

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