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चंद्र रत्न मोती - ये हैं इसके लाभ

ज्योतिष-शास्त्र में बताये गये विभिन्न उपायों में रत्नो का भी बड़ा विशेष महत्व है और रत्नो के द्वारा बहुत सकारात्मक परिवर्तन भी जीवन में आते हैं जब हम कोई रत्न धारण करते हैं तो वह रत्न अपने ग्रह द्वारा प्रस्फुटित प्रकाश किरणों को आकर्षित करके हमारे शरीर तक पहुंचा देता है और अनावश्यक व हानिकारक किरणों के कम्पन्न को अपने भीतर सोख लेता है अतः रत्न ग्रहों के द्वारा ब्रह्माण्ड में फैली उनकी विशेष किरणों की ऊर्जा को मनुष्य को प्राप्त कराकर एक विशेष फ़िल्टर का कार्य करते हैं। परन्तु वर्तमान में रत्न धारण के विषय में बहुत सी भ्रांतियां देखने को मिलती हैं बहुत से व्यक्ति अपनी मर्जी से कोई भी रत्न धारण कर लेते हैं और बाद में उन्हें बड़ी समस्याएं उठानी पड़ती हैं। इसी प्रकार अधिकांश व्यक्ति अपनी राशि के अनुसार रत्न धारण कर लेते हैं और उन्हें समाधान मिलने के बजाये और समस्याएं बढ़ जाती हैं वास्तव में रत्न कभी भी हमारी राशि के अनुसार तो धारण किये ही नहीं जाते रत्न धारण में हमारी राशि नहीं बल्कि कुंडली की लग्न का महत्व होता है

सर्वप्रथम तो यह समझना चाहिए के रत्न धारण करने से होता क्या है इसके विषय में यह स्मरण रखें के रत्न पहनने से किसी ग्रह से मिल रही पीड़ा समाप्त नहीं होती या किसी ग्रह की नकारात्मकता समाप्त नहीं होती बल्कि किसी भी ग्रह का रत्न धारण करने से उस ग्रह की शक्ति बढ़ जाती है अर्थात जिस ग्रह से सम्बंधित रत्न पहना है आपकी कुंडली का वह ग्रह बलवान बन जाता है उससे मिलने वाले तत्वों में वृद्धि हो जाती है परन्तु हमारी कुंडली में सभी ग्रह हमें शुभ फल देने वाले नहीं होते कुछ ग्रह हमारी कुंडली के अशुभ कारक ग्रह होते हैं और उनकी भूमिका हमें समस्या, संघर्ष और कष्ट देने की ही होती है अब यदि ऐसे ग्रह का रत्न धारण कर लिया जाये तो वह अशुभ कारक ग्रह भी बलवान हो जायेगा जिससे वह और अधिक समस्याएं देगा अतः यह तो निश्र्चित है के किसी भी व्यक्ति के लिए हर एक रत्न शुभ नहीं होता। रत्न धारण में हमारी जन्मकुंडली की लग्न का ही महत्व होता है कुंडली के लग्नेश और लग्नेश के मित्र ग्रह जो त्रिकोण(1,5,9) के स्वामी भी हों उन्ही ग्रहों का रत्न धारण किया जाता है। यह बात भी ध्यान रखें के रत्न धारण का कुंडली में चल रही दशाओं से भी कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है ऐसा बिलकुल नहीं है के जिस ग्रह की महादशा या अंतर्दशा चल रही है उसी ग्रह का रत्न धारण कर लिया जाये तो बिना विश्लेषण के यह हानिकारक हो सकता है क्योंकि केवल हमारी कुंडली के शुभ फल कारक ग्रहों के रत्न ही धारण किये जाते है जो हमारे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाते हैं

मोती -

ज्योतिष की रत्न शाखा में चन्द्रमाँ के लिए "मोती" को निश्चित किया गया है जिसे हम पर्ल नाम से भी जानते हैं मोती एक प्रकार से चन्द्रमाँ का ही प्रतिरूप होता है इसमें चन्द्रमाँ के गुण विद्यमान होते हैं, मोती स्वेत रंग की आभा से पूर्ण शीतल प्रभाव रखने वाला एक सौम्य प्रवर्ति का रत्न है रत्न है जिसे ज्योतिषीय दृष्टि में चन्द्रमाँ को बली या मजबूत करने के लिए धारण किया जाता है, सामान्यतः कुंडली में चन्द्रमाँ कमजोर या पीड़ित होने पर ज्योतिषी मोती धारण करने की सलाह देते हैं।

मोती धारण करने से व्यक्ति में सौम्यता व शीतलता का उदय होता है, मन एकाग्र होता है ओवर थिंकिंग, नेगेटिव थिंकिंग, मानसिक तनाव, एंग्जायटी और डिप्रेशन जैसी समस्याओं में मोती धारण करने से लाभ होता है इसके अलावा लंग्स से जुडी समस्या, अस्थमा, माइग्रेन, साइनस की समस्या, शीत रोग तथा मानसिक रोगों में भी मोती धारण करने से लाभ होता है तथा मानसिक अस्थिरता से व्यक्ति एकाग्रता की और बढ़ने लगता है स्थूल रूप में कहा जाये तो मोती धारण करने से पीड़ित या कमजोर चन्द्रमाँ के सभी दुष्प्रभावों में लाभ व सकारात्मक परिवर्तन होता है। ............ परंतु आब यहाँ सबसे विशेष बात यही है के प्रत्येक व्यक्ति को मोती धारण नहीं करना चाहिए मोती धारण करना सभी व्यक्तियों के लिए शुभ हो ऐसा बिलकुल भी आवश्यक नहीं है अधिकांश लोग की सोच होती है के मोती तो सौम्य प्रवर्ति का रत्न है और इसे धारण करने से तो मानसिक शांति मिलती है इसलिए हमें भी मोती धारण कर लेना चाहिए पर यहाँ यह बड़ी विशेष बात है के बहुतसी स्थितियों में मोती आपके लिए मारक रत्न का कार्य भी कर सकता है और मोती धारण करने पर बड़े स्वास्थ कष्ट, बीमारियां, दुर्घटनाएं और संघर्ष बढ़ सकता है इसलिए अपनी इच्छा से बिना किसी योग्य ज्योतिषी की सलाह के मोती नहीं धारण करना चाहिए, वास्तव में कुंडली में चन्द्रमाँ कमजोर होने पर मोती धारण की सलाह केवल उन्ही व्यक्तियों को दी जाती है जिनकी कुंडली में चन्द्रमाँ शुभ कारक ग्रह होता है, क्योंकि मोती धारण करने से कुंडली में चन्द्रमाँ की शक्ति बहुत बढ़ जाती है और ऐसे में यदि चन्द्रमाँ कुंडली का अशुभ फल देने वाला ग्रह हुआ तो मोती पहनना व्यक्ति के लिए बहुत हानिकारक सिद्ध होगा इसलिए किसी योग्य ज्योतिषी से अपनी कुंडली का विश्लेषण कराने के बाद की मोती धारण करना चाहिए और यदि चन्द्रमाँ आपकी कुंडली का शुभ कारक ग्रह है तो निःसंदेह मोती धारण से बहुत शुभ परिणाम प्राप्त होंगे। .......

लग्न अनुसार मोती धारण -

समान्यतः मेष, कर्क, वृश्चिक और मीन लग्न के जातकों के लिए मोती धारण शुभ है। इसके अलावा वृष, मिथुन, कन्या, तुला और मकर लग्न के लिए मध्यम है अतः इन लग्नो में भी योग्य ज्योतिषी से परामर्श के बाद मोती धारण किया जासकता है। परंतु सिंह, धनु और कुम्भ लग्न की कुंडली होने पर मोती कभी नहीं धारण करना चाहिए अन्यथा यह हानिकारक हो सकता है और इसके विपरीत परिणाम भी मिल सकते हैं।
व्यक्ति की आयु, भार तथा कुंडली में चन्द्रमाँ की स्थिति का पूरा विश्लेषण करने पर मोती के भार को निश्चित किया जाता है पर स्थूल रूप से देखें तो आयु 25 वर्ष से कम होने पर सवा पाँच रत्ती, आयु 25 से 50 वर्ष के मध्य में सवासात रत्ती तथा 50 से ऊपर सवा नौ रत्ती वजन का मोती धारण किया जाता है कुंडली में चन्द्रमाँ कितना कमजोर या पीड़ित स्थिति में है इससे भी मोती की क्वांटिटी पर प्रभाव पड़ता है।

मोती धारण विधि -

मोती को चाँदी की अंगूठी में बनवाकर सीधे हाथ की कनिष्ठा या अनामिका उंगली में धारण कर सकते हैं इसके अतिरिक्त सफ़ेद धागे या चांदी की चेन के साथ लॉकेट के रूप में गले में भी धारण कर सकते हैं मोती को सोमवार के दिन प्रातः काल सर्व प्रथम गाय के कच्चे दूध व गंगाजल से अभिषेक करके धुप दीप जलाकर चन्द्रमाँ के मन्त्र का तीन माला जाप करना चाहिए फिर पूर्व या उत्तर दिशा की और मुख करके मोती धारण कर लेना चाहिए। ......
मोती धारण मन्त्र - ॐ सोम सोमाय नमः

।।श्री हनुमते नमः।।

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