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विजय पर्व विजय-दशमी इस बार दशहरा पूजन -

"विजय दशमी" भारत के स्वर्णिम और समृद्ध इतिहास से ही जुड़ा एक बहुत विशेष पर्व है जिसे हम "दशहरे" के नाम से भी जानते हैं इसके नाम में विजय शब्द होने से ही आभास हो जाता है के यह विजय का पर्व है, त्रेता युग में इसी दिन भगवान् श्री राम ने रावण के अहम को नष्ट कर उसका संहार किया था इसी लिए इस दिन को अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है अधर्म पर धर्म की विजय होने से ही इसे विजय दशमी का नाम दिया गया एक तो इस दिन दस शीश वाले रावण का प्रभु राम ने संहार किया दूसरा शास्त्रोक्त दृष्टि से विजय दशमी के इस दिव्य दिवस को दस प्रकार के विकारों (काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद,मत्सर,अहंकार,आलस्य,हिंसा,चोरी) का हरण करके सत्प्रेरणा देने वाला पर्व भी माना गया है इसलिए इसे दशहरा भी कहते हैं।

हिंदी वैदिक पंचांग के अनुसार अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजय दशमी या दशहरा का पर्व मनाया जाता है इस बार 25 अक्टूबर रविवार को सुबह 7 जबकर 41 मिन्ट पर ही नवमी समाप्त होकर दशमी तिथि शुरू हो जाएगी इसलिए इस बार दशहरे का 25 अक्टूबर रविवार को ही मनाया पर्व मनाया जायेगा, दशहरा अधर्म पर धर्म की विजय का पर्व तो है ही पर वास्तव में यह शक्ति पूजा का भी पर्व है प्रभु श्री राम ने नौ दिनों तक शक्ति उपासना कर शक्ति अर्जन करके दसवे दिन रावण का संहार किया था इसलिए दशहरे को शक्ति पूजा के पर्व के रूप में भी मनाया जाता है दशहरे के दिन विशेष रूप से विद्या पूजा की जाती है अर्थात व्यक्ति के जीवन में उसके कार्य के अनुरूप जो भी शस्त्र हों उनकी पूजा इस दिन की जाती है क्षत्रिय इस दिन अपने शश्त्रों की पूजा करते हैं तो ब्राहमण शास्त्रों की पूजा करते हैं क्योंकि शास्त्र ही ब्राह्मण का शस्त्र हैं इसी प्रकार विद्यार्थियों को इस दिन अपनी पुस्तकों का पूजन, कारीगरों को अपने औजारों का, चिकित्सकों को अपने उपकरणों का, लेखकों को कलम का पूजन करना चाहिए कहने का तात्पर्य है अपनी विद्याओं का पूजन इस दिन करना चाहिए इसके साथ दशहरा पूजन में माँ शक्ति के पूजन के साथ साथ श्री राम दरबार का विशेष पूजन किया जाता है

इस बार दशहरा पूजन -

25 अक्टूबर दशहरे के दिन सुबह 8 बजकर 13 मिन्ट से 10:31 के बीच थिर लग्न (वृश्चिक) चल रही होगी और इसके अलावा सुबह 8 बजे से दोपहर 12 बजे के बीच चर लाभ और अमृत के शुभ चौघड़िया मुहूर्त भी उपस्थित रहेंगे इसलिए दशहरा पूजन के लिए सुबह 8:13 से 10:31 के बीच श्रेष्ठ मुहूर्त होगा पर इसके बाद भी 12 बजे तक शुभ चौघड़िया की उपस्थिति के कारण पूजन का शुभ समय रहेगा।

दशहरे का पर्व अपने में बड़ा ही विशेष महत्व रखने वाला माना गया है शास्त्रोक्त दृष्टि से इस दिन में विजय नामक मुहूर्त विद्यमान होने से इसे विजय का दिन माना गया है विजय दशमी या दशहरे को एक सिद्ध मुहूर्त माना गया है जिसमे किये गए या आरम्भ किये गए शुभ कार्यों में सफलता प्राप्त होती है ऐसी मान्यता है के इस दिन मन में यदि कोई शुभ संकल्प किया जाये तो उसकी पूर्ती होती है इसलिए दशहरे के पर्व को शुभ संकल्प का पर्व भी माना गया है विजय दशमी के दिन दशहरा पूजन के बाद बहने के द्वारा अपने भाइयों को तिलक करने की भी परम्परा है यह वास्तव में विजय तिलक की ही परम्परा है इस दिन बहने अपने भाइयों को तिलक करके जीवन में सदैव उनकी विजय की कामना करती है।

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