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कुंडली में पितृ दोष की वास्तविकता

हिन्दू वैदिक दर्शन में मनुष्य को देव, ऋषि और पितृ इन तीनो का ऋणी माना गया है इसीलिए अपने जीवन में अर्जित किये गए पदार्थों में से कुछ अंश देव ऋषि और अपने पितरोँ के लिए समर्पित किये जाने की परंपरा है.......... पितरों से तात्पर्य हमारे पूर्व वंशजों या वंश के पूर्वजों से ही है जो पितृयोनि में अप्रकट रूप से विशेष स्थिति में अपने वंशजों से जुड़े रहते हैं

आज यहाँ पर हम विशेष रूप से जातक की कुंडली में उपस्थित पितृ दोष पर चर्चा कर रहे हैं तो पहले यहाँ यह समझना भी आवश्यक है के किसी व्यक्ति की कुंडली में उपस्थित पितृ दोष यह दर्शाता है के पूर्व जन्मो में व्यक्ति का अपने पूर्वजों, बुजुर्गों या पितृ पक्षों के प्रति कुछ गलत आचरण या व्यव्हार रहा है जिसके फलस्वरूप वर्तमान जन्म में जन्मकुंडली में पितृ दोष के रूप में प्रदर्शित होता है

अब फलित और व्यावहारिक ज्योतिष की दृष्टि से यदि पितृदोष को देखें तो फलित ज्योतिष में विशेष रूप से बृहस्पति को पूर्व वंशजों और पितरों का कारक माना गया है इसके अलावा सूर्य को भी पितृ पक्ष में विशेष भूमिका रखने वाला माना गया है तथा जन्म कुंडली का नवम भाव भी हमारे पूर्वजों को प्रदर्शित करता है.........तो विशेष रूप से जब जन्मकुंडली में बृहस्पति नीचस्थ हो राहु से पीड़ित हो या कुछ विशेष स्थितियों में होकर बहुत पीड़ित हो तो इससे पितृ दोष बनता है इसी प्रकार सूर्य का भी पीड़ित होना और नकारात्मक प्रभाव में होना भी पितृ दोष उत्पन्न करता है.........

पितृ दोष की कुछ विशेष स्थितियां -

1. यदि कुंडली में बृहस्पति और राहु एक साथ हों तो पितृदोष बनता है।

2. यदि बृहस्पति नीच राशि में हो तो पितृदोष बनता है।

3. बृहस्पति यदि आठवे या बारहवे भाव में हो तो भी पितृदोष होता है।

4. सूर्य का राहु के साथ होना और नीचस्थ होना भी पितृ दोष को दर्शाता है।

6. यदि कुंडली के नवम भाव में राहु नीच राशि में स्थित हों तो भी पितृदोष बनता है या नवम भाव में किसी अन्य प्रकार कोई पाप योग बना हो।

विशेष रूप से पितृदोष तभी बाधक बनता है जब कुंडली में बृहस्पति बहुत अधिक पीड़ित होता है और किसी भी प्रकार बृहस्पति पर मित्र ग्रहों का प्रभाव नहीं होता…. यदि कुंडली में पितृदोष हो तो जीवन में संघर्ष की अधिकता रहती है और बार बार बाधाएँ उत्पन्न होती हैं और जीवन का विकास एक सीमा के पार नहीं पहुँच पाता.....

पर व्यावहारिक रूप से यहाँ यह समझना बहुत आवश्यक है जैसा हम अधिकांश बताते भी हैं के किसी भी एक योग पर ही सब कुछ निर्भर नहीं करता पूरी कुंडली की अन्य सभी ग्रहस्थिति के आंकलन से ही किसी भी परिणाम पर पहुंचा जाता है इसलिए पितृदोष को लेकर भयभीत नहीं होना चाहिए वास्तव में जो माता पिता जीवन पर्यन्त अपनी संतान को सुख देने के लिए संघर्ष करते हैं वे मृत्यु पश्चात् किसी भी सूक्ष्म शरीर में क्यों न हो वहां से भी अपनी सन्तानो के लिए शुभ आशीर्वाद ही देंगे इसलिए हम व्यक्तिगत रूप से और व्यावहारिक ज्योतिष में भी पितृदोष की विशेष चर्चा नहीं करते पर हमारे कुछ फ़ॉलोअर्स की इस विषय में लिखने के लिए बहुत बार इच्छा प्रकट करने पर हमने इस विषय पर चर्चा की है............. जन्मकुंडली में पितृदोष की उपस्थिति का वास्तविक कारण यही होता है के अपने मातृपितृ पक्ष के साथ हमारा अच्छा व्यव्हार या आचरण ना होने पर भी माता पिता तो अपनी सन्तानो के लिए शुद्ध भावना ही रखते हैं परन्तु प्रकृति अपने कार्य को अवश्य पूरा करती है और पूर्व जन्मो में व्यक्ति द्वारा अपने मातृपितृ पक्ष या बुजुर्गों के प्रति किये गए दुर्व्यहार को ही नियति व्यक्ति की जन्मकुंडली में पितृदोष के रूप में प्रकट करती है जिससे जीवन में बाधाओं की उत्पत्ति होती है……..

यदि कुंडली में पितृदोष होने से जीवन में संघर्ष की स्थीति बनी रहती हो तो ये उपाय करना सहायक होगा -

1. ॐ ग्राम ग्रीम ग्रोम सः गुरवे नमः का एक माला प्रतिदिन जाप करें।

2. प्रत्येक अमावस्या को पितरों के निमित्त दूध का दान ब्राह्मण को करें।

3. प्रत्येक बृहस्पतिवार को गाय को बेसन से बनी मिठाई खिलाएं।

4. प्रत्येक अमावस्या वाले दिन चावल की खीर बनाकर गरीब व्यक्तियों में बाटें।

।।श्री हनुमते नमः।।

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