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क्या होता है वर्गोत्तमी ग्रह

फलित ज्योतिष में हम बहुत बार वर्गोत्तमी ग्रह या ग्रह के वर्गोतमांश में होने की बात सुनते हैं या बहुतसे ज्योतिषीय लेखों में ग्रह के वर्गोत्तमी होने का जिक्र सामने आता है तो वास्तव में यह वर्गोत्तमी ग्रह होता क्या है आईये जानते हैं -

ज्योतिष में फलित का मुख्य आधार या जन्मपत्रिका में ग्रहस्थिति के फल और परिणाम के लिए "लग्न कुंडली" का ही विशेष महत्व होता है और लग्न कुंडली में बनी ग्रह-स्थिति ही हमारे जीवन चक्र को निश्चित करती है अतः ज्योतिष में फलित का आधार तो लग्न कुंडली ही होती है पर जीवन के अलग अलग पक्षों को विस्तृत और गूढ़ रूप में देखने के लिए लग्न राशि को अंशों के आधार पर विभिन्न भागों में बाटकर अलग अलग सोलह कुंडलियां बनाई जाती हैं जिसे ज्योतिष में षोडशवर्ग के नाम से जाना जाता है इनमे से प्रत्येक कुंडली जीवन के किसी एक विशेष पक्ष और लग्न कुंडली के किसी एक भाव का विस्तृत रूप ही होती है पर लग्न कुंडली के बाद षोडश वर्ग में से जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण कुंडली मानी गयी है उसे नवमांश या "नवांश कुंडली" कहते हैं और यही हमारे शीर्षक विषय का आधार है। ........ 30 डिग्री की लग्न राशि को 9 बराबर भागों (3 अंश 20 कला) में बाटने पर नवांश कुंडली बनती है। ......
फलित ज्योतिष में नवांश कुंडली को भी लग्न कुंडली के समतुल्य ही माना गया है इसलिए योग्य ज्योतिषी लग्न और नवांश दोनों कुंडलियों का विश्लेषण कर ही अंतिम निर्णय पर पहुँचते हैं, लग्न कुंडली में कमजोर ग्रह यदि नवांश कुंडलीं में बली या मजबूत हो जाये तो वह कमजोर ना रहकर मध्यम शुभ हो जाता है इसी प्रकार लग्न में बली होने पर यदि नवांश में कमजोर हो जाये तो पूर्ण बली ना होकर मध्यम बली माना जाता है। ....................

वर्गोत्तमी ग्रह -

जब कोई भी ग्रह लग्न कुंडली और नवांश कुंडली दोनों में समान राशि में हो अर्थात यदि कोई ग्रह लग्न कुंडली में जिस राशि में स्थित है नवांश कुंडली में भी उसी राशि में स्थित हो तो ऐसे ग्रह को फलित ज्योतिष में "वर्गोत्तमी ग्रह" कहा जाता है उदाहरण के लिए यदि सूर्य लग्न कुंडली में मिथुन राशि में स्थित है और नवांश कुंडली में भी मिथुन राशि में है तो यहाँ सूर्य वर्गोत्तमी हो गया है.....वर्गोत्तमी ग्रह को बहुत बली, मजबूत और शुभ फल देने वाला माना जाता है वर्गोत्तमी ग्रह स्वराशि में स्थित ग्रह की तरह बलवान होता है और बलवान ग्रह की तरह ही परिणाम देता है अतः कुंडली में यदि कोई ग्रह वर्गोत्तमी हो तो जीवन में उसके कारक तत्व अच्छी स्थिति में प्राप्त होते हैं, यदि कोई ग्रह स्व राशि या अपनी उच्च राशि में होकर वर्गोत्तमी हो तो बहुत विशेष बली और फलकारी होता है .................. अब वर्गोत्तमी ग्रह को लेकर कुछ विशेष बातें और समझनी चाहियें कुंडली में किसी भी ग्रह का वर्गोत्तमी होना निश्चित ही शुभ माना गया है पर यदि कोई ग्रह नीच राशि में बैठकर वर्गोत्तमी हो अर्थात लग्न कुंडली और नवांश कुंडली दोनों में ही नीच राशि में हो तो यहाँ ग्रह दोनों कुंडलियों में समान राशि में तो है पर यहाँ वर्गोत्तमी ग्रह अपना कोई परिणाम नहीं देता बल्कि और अधिक कमजोर हो जाता है क्योंकि लग्न और नवांश दोनों में ग्रह का बल मिलकर उसके निश्चित बल का आंकलन किया जाता है और ऐसे में यदि ग्रह लग्न और नवांश दोनों कुंडलियों में ही नीच राशि में हो तो वह निश्चित ही कमजोर ग्रह की श्रेणी में आता है और जीवन में संघर्ष उत्पन्न करता है।

।।श्री हनुमते नमः।।

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