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श्री गणेश चतुर्थी का महत्व - इस रंग के गणपति करें स्थापित

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के सृष्टा, पालनकर्ता और संहारकर्ता से भी पहले और सभी शक्तियों से प्रथम यदि कोई पूज्य है तो वह हैं भगवान् श्री गणेश कोई भी कार्य चाहे आध्यात्मिक हो या सांसारिक श्री गणेश के प्रथम पूजन के बिना सफल नहीं होता, भगवान् गणेश के प्रथम पूज्य होने के पीछे उनकी मातृ-पितृ भक्ति और आस्था की कथा से तो हम सभी परिचित हैं ही, भगवान् गणेश को प्रथम पूज्य होने के साथ साथ बुद्धि, विद्या, ज्ञान, समृद्धि और सफलता का देवता माना गया है।

गणेश चतुर्थी -

गणेश चतुर्थी का पर्व पूरे भारत-वर्ष में पूर्ण श्रद्धा और बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, यह पर्व भगवान् श्री गणेश के प्राकट्योत्सव या जन्मोत्सव के रूप में प्रतिवर्ष मनाया जाता है, हिन्दू पंचांग के अनुसार "भाद्रपद मास" के "शुक्ल पक्ष" की "चतुर्थी तिथि" को गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जाता है पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी दिन भगवन श्री गणेश का प्राकट्य हुआ था। गणेश चतुर्थी के दिन भगवान् गणेश के निमित्त विशेष पूजा-अर्चना करके फल फूल और विभिन्न मिष्ठान अर्पण करके जीवन के मंगल की प्रार्थना की जाती है और इस दिन गणेश जी के निमित्त व्रत भी किया जाता है। “इस बार 2 सितम्बर सोमवार के दिन श्री गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जायेगा” इस दिन श्री गणेश जी की पूजा-अर्चना से बुद्धि विद्या, समृद्धि, शुभ-लाभ और सफलता की प्राप्ति होती है। गणेश जी को भगवान् शिव के गणों का नायक या नेतृत्वकर्ता माना गया है अतः श्री गणेश की पूजा से व्यक्ति में नेतृत्व की शक्ति का उदय होता है तथा गणेश जी की कृपा से सभी विघ्नों का नाश होता है, गणेश जी को विशेष रूप से मोदक और मोतीचूर के लड्डू का भोग लगाना चाहिए ये उनके प्रिय मिष्ठान हैं।

गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन के विषय में एक बात अवश्य वर्णनीय है पौराणिक कथाओ के अनुसार इस दिन चंद्र दर्शन को निषिद्ध माना गया है पौराणिक वर्णन के अनुसार इस दिन चंद्र दर्शन करने पर कलंक का सामना करना पड़ता है पर यदि चंद्र दर्शन हो जाय तो भगवान् गणेश की आराधना करनी चाहिए इससे दोष नष्ट हो जाता है।

वर्तमान समय में गणेश चतुर्थी के पर्व का हम जो विराट स्वरुप देखते हैं वह कालांतर में विकसित हुआ विशेषकर महाराष्ट्र और उसके आस पास के प्रान्तों में गणेशचतुर्थी का पर्व पूरे ग्यारह दिन तक जिस धूम धाम के साथ मनाया जाता है वह वास्तव में दर्शनीय है और वर्तमान समय में गणेशचतुर्थी पर श्री गणेश जी की मूर्ती को घर में स्थापित करके ग्यारह दिनों का उत्सव मनाने की यह परंपरा देश के कोने कोने में फ़ैल गयी है आज इतने हर्षोल्लास के साथ मनाया जाने वाले इस गणेशोत्सव की शुरुआत ब्रिटिश शाशन के समय "श्री बाल गंगाधर तिलक" ने शुरू की थी जिससे स्वतंत्रता सैनानी इस पर्व के दौरान आपस में मिलकर विचार विमर्श करते थे इस प्रकार उन्होंने इस धार्मिक पर्व को सामाजिक मेल जोल का सकारात्मक रूप भी दे दिया था।

“ज्योतिषीय दृष्टि कोण से गणेश जी को बुध ग्रह का अधिपति देव माना गया है और बुध मिथुन और कन्या राशि का स्वामी है अतः मिथुन और कन्या राशि वाले लोगो के लिए गणेश जी की पूजा बहुत शुभफलकारी होती है, जिन लोगो की जन्म कुंडली में बुध की महादशा हो उन्हें गणेश जी की विशेष पूजा अवश्य करनी चाहिए इसके अतिरिक्त गणेश जी की पूजा से केतु के कारण मिल रही सभी बाधायें दूर हो जाती हैं”

किस रंग के गणपति करे स्थापित -

गणेश चतुर्थी के दिन यदि अपनी राशि के अनुसार रंग के गणपति का आगमन घर में होगा तो इसके बहुत श्रेष्ठ परिणाम प्राप्त होंगे -

मेष राशि और वृश्चिक राशि के व्यक्ति - लाल रंग के गणपति स्थापित करें।

वृष राशि और तुला राशि के व्यक्ति - सिल्वर व्हाइट और आभूषणों से युक्त गणपति स्थापित करें।

मिथुन और कन्या राशि के व्यक्ति - हरे रंग से युक्त गणपति स्थापित करें।

कर्क राशि के व्यक्ति - सफ़ेद रंग की आभा वाले गणपति स्थापित करें।

सिंह राशि के व्यक्ति - गेरुए रंग के गणपति स्थापित करें।

धनु और मीन राशि के व्यक्ति - पीले रंग की आभा वाले गणपति स्तापित करें।

मकर और कुम्भ राशि के व्यक्ति - नीले व आसमानी रंग की आभा वाले गणपति स्थापित करें।

।। श्री हनुमते नमः।।

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