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ज्योतिष प्रश्नावली के बहुत ज्ञानवर्धक तथ्य अवश्य पढ़िए

प्रश्न - यदि कुंडली में शुक्र नीच राशि में हो तो क्या फल होता है ?

उत्तर - शुक्र धन ऐश्वर्य और विलासिता का कारक है यदि कुंडली में शुक्र नीच राशि में हो तो ऐसे में व्यक्ति को आर्थिक संघर्ष का सामना करना पड़ता है आर्थिक स्थिति एक सीमा के आगे नहीं जा पाती कुंडली में बने अन्य शुभ योगो के कारण व्यक्ति को आर्थिक प्राप्ति तो हो सकती है परंतु शुक्र नीच राशि में होने के कारण जीवन में वैभव नहीं आ पाता, यदि पुरुष जातक की कुंडली में शुक्र नीच राशि में हो तो ऐसे में विवाह होने में अड़चने आना और वैवाहिक जीवन में उतार चढ़ाव की स्थिति बनी रहती है इसके अतिरिक्त नीचस्थ शुक्र के कारण यूरिन रिलेटेड प्रॉब्लब, हार्मोनल इनबेलेन्स और शुगर लेवल को लेकर भी समस्याएं सम्भावित होती हैं।


प्रश्न - क्या बुधादित्य योग हमेशा एक समान अच्छा फल देता है ?

उत्तर - नहीं, कुंडली में यदि बुध और सूर्य एक साथ हों तो इसे बुधादित्य योग कहते हैं समान्यतः कुंडली में बुधादित्य योग होने पर व्यक्ति बहुत बुद्धिमान तर्कशील वाक्पटु और दूरद्रष्टा होता है परंतु ऐसा प्रत्येक स्थिति में नहीं होता, कुंडली में यदि बुधादित्य योग लग्न, पंचम भाव, नवमभाव और दशम भाव में हो तो इसे बुधादित्य योग की श्रेष्ठ स्थिति माना जाता है जिसमे यह योग श्रेष्ठ फल करता है परंतु यदि बुधादित्य योग दुख:भाव (छठा, आठवा, बारहवा) में बन रहा हो तो पूर्ण फल नहीं करता इसके अलावा बुधादित्य योग बनने पर यदि सूर्य बुध के साथ राहु, शनि, मंगल या केतु भी हो तो भी बुधादित्य योग भंग होजाता है, बुधादित्य योग बनने पर भी सूर्य और बुध की डिग्री में जितना अधिक अंतर होगा उतना अच्छा परिणाम होगा।


प्रश्न - क्या कोई भी हमारी राशि के अनुसार धारण किया जाता है ?

उत्तर - नहीं, यह एक बहुत बड़ी भ्रान्ति है वास्तव में हमारी राशि और रत्न धारण करने का आपस में कोई सम्बन्ध है ही नहीं और यदि कोई ऐसा करता है तो उसे लाभ की जगह हानि का सामना करना पड़ सकता है, रत्न धारण करने में पूरी तरह हमारी कुंडली की जन्म-लग्न का महत्त्व होता है लग्न और कुंडली की ग्रहस्थिति को देखकर ही यह निर्धारित किया जा सकता है के उसके लिए कौनसा रत्न लाभकारी और कौनसा हानिकारक है इसलिए किसी योग्य ज्योतिषी की सलाह के बाद ही कोई भी रत्न धारण करना चाहिए और यदि किसी व्यक्ति की जन्म तिथि और समय ना पता होने के कारण उसकी कुंडली ही उपलब्ध ना हो तो ऐसे में उसे कोई भी रत्न धारण ना करके उस ग्रह के अन्य उपाय करने चाहियें।


प्रश्न - यदि कोई व्यक्ति प्रोपर्टी सम्बंधित बिजनेस करना चाहे तो इसके लिए कौनसे ग्रह मजबूत होने चाहियें ?

उत्तर - ज्योतिषीय दृष्टिकोण से प्रोपर्टी या जमीन जायदात से जुड़े कार्य के लिए "मंगल" की विशेष भूमिका होती है मंगल को भूमि या जमीन जायदात का कारक माना गया है अतः यदि कुंडली में मंगल मजबूत स्थिति में हो स्व उच्च राशि (मेष, वृश्चिक, मकर) में हो केंद्र (पहला, चौथा, सातवाँ, दसवा भाव) या त्रिकोण भाव (पहला, पांचवा, नौवा भाव) में होकर बली हो तो प्रोपर्टी के कार्य में सफलता देता है परंतु यहाँ यह देखना बहुत जरुरी है के उस व्यक्ति की कुंडली में बिजनेस के लिए भी अच्छे योग हैं या नहीं यदि कुंडली में लाभ स्थान (ग्यारहवा भाव) और लाभेश कमजोर या पीड़ित हों तो मंगल मजबूत होने पर भी स्वतंत्र व्यवसाय में सफलता नहीं मिलेगी।


प्रश्न - किसी व्यक्ति के विवाह में विलम्ब के पीछे कौनसे विशेष ग्रहयोग होते हैं ?

उत्तर - हमारी जन्कुंडली में सप्तम भाव और सप्तमेश (सप्तम भाव का स्वामी ग्रह) हमारे वैवाहिक जीवन का प्रतिनिधित्व करते हैं इसके अलावा पुरुष की कुंडली में शुक्र वैवाहिक जीवन को नियंत्रित करता है और स्त्री की कुंडली में मंगल उसके पति-सुख या मांगल्य को नियंत्रित करता है अतः यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में सातवां भाव पीड़ित हो सातवे भाव में कोई पाप योग बन रहा हो या सप्तमेश दुःख भाव (छठा, आठवा, बारहवा) में हो नीच राशि में हो या सप्तमेश किसी अन्य प्रकार कमजोर हो तो ऐसे में विवाह होने में बहुत बाधाएं आती हैं और बहुत विलम्ब के बाद विवाह योग बनता है इसी प्रकार यदि पुरुष की कुंडली में शुक्र पीड़ित हो और स्त्री की कुंडली में मंगल पीड़ित हो तो विवाह होने में बाधाएँ और विलम्ब का सामना होता है।


प्रश्न - यह कैसे पता चलता है के किसी व्यक्ति पर शनि की साढेसाती चल रही है ?

उत्तर - यह ज्योतिष का बहुत संवेदनशील विषय है जिसकी सामान्य जानकारी सबके लिए आवश्यक है....... शनि की साढ़ेसाती का हमारी जन्मराशि से सम्बन्ध होता है वास्तव में गोचरवश जब शनि हमारी राशि से बारहवीं राशि (हमारी राशि से पीछे वाली राशि) में आता है तब हमारी राशि पर शनि की साढेसाती शुरू हो जाती है जिसमे साढेसाती के पहले ढाई वर्ष शनि हमारी राशि से बारहवीं राशि में गोचर करता है दूसरे ढाई वर्ष हमारी राशि में चलता है और साढेसाती के आखरी ढाई वर्ष शनि हमारी राशि से दूसरी राशि अर्थात हमारी राशि से अगली राशि में गोचर करता है इस प्रकार एक राशि पर शनि की साढेसाती पूरी होती है जब शनि हमारी राशि से तीसरी राशि में प्रवेश करता है


प्रश्न - यदि राहु की दशा बहुत दुष्परिणाम दे रही हो तो इसके लिए क्या उपाय करने चाहियें ?

उत्तर - विशेष रूप से राहु जब कुंडली के आठवे, बारहवे या चौथे भाव में हो, नीच राशि (धनु /वृश्चिक) या कुंडली के अकारक ग्रहों के साथ होता है तभी राहु की दशा अधिक समस्याएं देती है ऐसे में यह उपाय करें लाभ मिलेगा -
1. ॐ राम राहवे नमः का नियमित जाप करें (एक माला रोज)
2. प्रत्येक शनिवार को साबुत उडद का दान करें।
3. सफ़ेद चन्दन की माला गले में पहने।
4. प्रतिदिन पक्षियों को भोजन दें।
5. गौमेद न धारण करें।


प्रश्न - किसी भी कार्य के लिए कौनसी राशि देखें कुंडली में निकली हुई जन्मराशि या बोलते नाम की राशि ?

उत्तर - वास्तव में तो हमारे जन्म के समय जिस राशि में हमारा जन्म होता है वही हमारी वास्तविक राशि होती है और सभी ग्रह उसी जनराशि के अनुसार हमें प्रभावित करते हैं पर अधिकांश लोगो का बोलता नाम जन्माक्षर से भिन्न अक्षर पर होने से उनके बोलते नाम के अनुसार अलग राशि बन जाती है पर यहाँ इस बात को ध्यान रखें किसी भी कार्य के लिए हमेशा हमारी जन्मराशि (कुंडली में चन्द्रमाँ जिस राशि में हो) की ही प्राथमिकता होती है इसलिए अपनी वासतविक जन्मराशि के अनुसार ही ग्रहों के प्रभाव की गणना करनी चाहिए यदि किसी व्यक्ति की बर्थ डिटेल उपलब्ध ना होने के कारण उसकी कुंडली ही नहीं बन पायी तो यह विशेष परिस्थिति है इसमें व्यक्ति अपने मुख्य नाम की राशि मान सकते हैं परंतु यदि आपकी कुंडली उपलब्ध है तो अपनी कुंडली की जन्मराशि को ही मुख्य मन्ना चाहिए।


प्रश्न - यदि कुंडली में शनि नीच राशि में हो तो इसका क्या फल होता है ?

उत्तर - यदि कुंडली में शनि अपनी नीच राशि (मेष) में हो तो ऐसे में व्यक्ति को अपने करियर या आजीविका की स्थिरता के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है, करियर में उतार-चढ़ाव की स्थिति बनी रहती है किये गए प्रयासों का पूरा परिणाम नहीं मिल पाता इसके अतिरिक्त नीचस्थ शनि के कारण व्यक्ति को पाचनतंत्र की समस्या और ज्वाइटस्पेन की समस्या भी बनी रहती है।


प्रश्न - क्या राहु की दशा शुभ फल भी करती है ?

उत्तर - जी हाँ, ऐसा नहीं है के प्रत्येक व्यक्ति के लिए राहु की दशा बुरा ही फल करे विशेष रूप से यदि राहु कुंडली के ग्यारहवे भाव में हो तो इसे राहु की श्रेष्ठ स्थिति माना गया है जिसमे राहु की दशा बहुत शुभ फल देती है इसके अलावा यदि राहु कुंडली में तीसरे भाव में हो पंचम में हो नवम में हो कुंडली के लग्नेश पंचमेश या भाग्येश से प्रभावित हो तो ऐसे में भी राहु की दशा व्यक्ति को शुभ फल प्रदान करती है।

।।श्री हनुमते नमः।।

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