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बच्चों की कुंडली में "बालारिष्ठ योग"

ज्योतिषीय गणना के अनुसार जन्म से आठ वर्ष तक की अवस्था को "बालारिष्ठ" आठ से बीस तक योगरिष्ठ, बीस से बत्तीस तक अल्पायु, बत्तीस से सत्तर तक मध्यायु और सत्तर से सौ पूर्णायु कही गयी है, आज यहाँ हम विशेष रूप से बच्चो की कुंडली में बालारिष्ठ योग पर चर्चा कर रहे हैं जिस प्रकार हमारी जन्मकुंडली के जीवन के प्रत्येक घटक की पूर्वसंभवना को दर्शाती है उसी प्रकार जातक की आयु या जीवन में आने वाले गंभीर शारीरिक कष्टों का पूर्वानुमान भी जन्मकुंडली कराती है, बहुत बार हमें देखने को मिलता है के कुछ बच्चों को बहुत कम आयु में ही बहुत अधिक स्वास्थ कष्ट या शारीरिक कष्टों का सामना करना पड़ता है और बाल्यावस्था में होने वाले स्वास्थ या शारीरिक कष्टों को ही बालारिष्ठ की संज्ञा दी गयी है, असल में जन्मकुंडली में कुछ विशेष प्रकार के ग्रहयोगों के बनने पर ही बच्चो को अपनी बालयवस्था में शारीरिक या स्वास्थ कष्टों का सामना होता है तो यहाँ हम देखेंगे के ऐसे कोनसे ग्रहयोग होते हैं जो बच्चे की कुंडली में होने पर बालारिष्ठ योग बनाते हैं और साथ ही अगर बच्चे की कुंडली में बालारिष्ठ योग हैं तो ऐसे कौनसे उपाय शुरू से ही किये जासकते हैं जिससे बच्चे के स्वास्थ और आयु की रक्षा हो आयी जानते हैं - (हमारे इस आर्टिकल का विशेष हेतु केवल ये है के यदि बच्चे की कुंडली में कुछ ऐसे नकारात्मक ग्रहयोग हैं जो उसे बाल्यावस्था में अधिक स्वास्थ कष्ट को दर्शा रहे हैं तो इसके लिए पहले से ही सचेत होकर उपाय आदि किये जा सके जिससे भविष्य में बच्चे को सुरक्षा और सही मार्गदर्शन मिल सके)

“ज्योतिषीय दृष्टि से कुंडली का लग्न भाव, लग्नेश और अष्टम भाव जातक के स्वास्थ, शरीर, आयुपक्ष और बड़े संकटों को नियंत्रित करते हैं पर विशेष रूप से बच्चों की कुंडली में एक और बहुत महत्वपूर्ण ग्रह होता है जो बालयकाल को नियंत्रित करता है और वो महत्वपूर्ण ग्रह है चन्द्रमाँ, चन्द्रमाँ को बालयवस्था (विशेषतः चार वर्ष तक की आयु) का कारक माना गया है, तो बच्चो की कुंडली में विशेष रूप से यहाँ बताये गए सभी घटक जब पीड़ित या पापयोगों के अधिक प्रभाव में होते हैं तब ऐसे में बच्चे को स्वास्थ समस्याएं या शारीरिक कष्ट अधिक परेशान करते हैं और इन घटकों के अधिक पीड़ित होने पर ही बालारिष्ट योग भी बन जाता है. . . जब बच्चे की कुंडली में लग्नेश आठवे भाव में हो, लग्न में पाप योग बन रहे हों, चन्द्रमाँ छटे, आठवे भाव में हो राहु से पीड़ित हो, आठवे भाव में पाप ग्रहों का योग हो और लग्न लग्नेश व चन्द्रमाँ पर कोई शुभ प्रभाव न हो तो बच्चे को कम आयु में ही स्वास्थ और शारीरिक कष्टों का सामना होता है” (बालारिष्ट योग का अर्थ केवल आयु भय से बिलकुल नहीं समझना चाहिए ऐसा तो बहुत विषम स्थितियों में होता है पर हाँ कुंडली में बालारिष्ठ योग होने पर बच्चे को शारीरिक कष्ट अधिक परेशान करते हैं ऐसा समझना चाहिए)

बालारिष्ट के कुछ विशेष ग्रहयोग -

1. यदि बच्चे की कुंडली में लग्नेश आठवे भाव में हो और लग्न पर भी पाप ग्रहों का प्रभाव हो तो ऐसे में बालारिष्ठ योग बनता है।

2. कुंडली में यदि षष्टेश और अष्टमेश का योग लग्न में हो तो बालारिष्ठ योग बनता है।

3. यदि कुंडली के आठवे भाव में पाप योग जैसे गुरुचण्डाल योग, मंगल राहु का योग, मंगल शनि का योग, मंगल केतु का योग, ग्रहण योग आदि हो तो भी बालारिष्ट योग होता है।

4. यदि बच्चे की कुंडली में चन्द्रमाँ नीच राशि में हो, चन्द्रमाँ राहु के साथ हो, आठवे भाव में हो, चन्द्रमाँ राहु का योग छटे आठवे भाव या लग्न में हो तो भी बालारिष्ठ योग बनता है।

5. यदि कुंडली के लग्न भाव में चन्द्रमाँ राहु का योग हो, सूर्य राहु का योग हो, गुरु राहु का योग हो, मंगल राहु का योग हो तो ऐसे में भी बालारिष्ठ की स्थिति बनती है।

6. जब लग्नेश ग्रह नीच राशि में हो, छटे आठवे भाव में हो या कहते आठवे भाव के स्वामी के साथ हो और शुभ प्रभाव से वंचित हो तो भी बालारिष्ट की स्थिति बनती है।

7. बहुत बार बाल्यावस्था में कुंडली में चल रही मारकेश ग्रहों की दशाओं के कारण भी बालारिष्ठ की स्थिति बन जाती है।

8. यदि बच्चे का जन्म मूल नक्षत्रों में भी गाणांत वाली स्थिति में हो अर्थात दो नक्षत्रों की ठीक संधि के समय जन्म हो तो भी बालारिष्ठ की स्थिति बनती है।

9. केमद्रुम योग छटे आठवे भाव में हो या केमद्रुम योग में चन्द्रमाँ नीच राशि में हो।

यदि बच्चे की कुंडली के आठवे भाव में मंगल राहु के योग से बार बार चोट लगने या एक्सीडेंट्स की अधिक संभावनाएं होती हैं, अष्टम भाव में मंगल केतु का योग विद्युत अर्थात बिजली और आग से संभावित दुर्घटनाओं को दर्शाता है।तो यदि बच्चे की कुंडली में ये कुछ विशेष ग्रहयोग हों तो ऐसे में बच्चे को शारीरिक कष्ट और स्वास्थ समस्याएं अधिक आती हैं और ऐसे बच्चो को बार बार गिरने पड़ने या चोट लगते रहने की समस्या भी बहुत होती है इसलिए बच्चे की कुंडली में यदि इस प्रकार के ग्रहयोग हों तो आरम्भ से ही इन पाप ग्रहयोगों के लिए दान जाप आदि ज्योतिषीय उपाय करने से इनके दुष्परिणाम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

विशेष - यहाँ एक बात को समझना बहुत आवश्यक है के जन्मकुंडली के ज्योतिषीय विश्लेषण में कभी भी केवल किसी भी एक योग या एक ग्रह की गणना से परिणाम नहीं निकाला जाता बल्कि पूरी कुंडली के विश्लेषण और सभी ग्रहों की स्थिति के विचार के बाद ही निष्कर्ष पर पहुंचा जाता है इसलिए बच्चे की कुंडली बालारिष्ट योग होने के साथ साथ अन्य शुभ योग भी हों तो स्थिति गंभीर न होकर सामान्य समस्या वाली ही होती है - यदि बच्चे की कुंडली में लग्नेश ग्रह केंद्र त्रिकोण में शुभ स्थित में हो लग्न पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो बच्चे के स्वास्थ और आयु दोनों की बड़े संकटों से हमेशा रक्षा होती है, इसी प्रकार यदि बृहस्पति केंद्र में हो विशेष रूप से यदि लग्न में हो तो भी ऐसे में बच्चे की कुंडली के बालारिष्ठ योग क्षीण पड़ जाते हैं, यदि बच्चे की कुंडली में चन्द्रमाँ शुभ स्थिति में केंद्र त्रिकोण में हो तो भी बाल्यावस्था के कष्टों से रक्षा होती है। बच्चे की कुंडली में बृहस्पति की शुभ स्थिति ही सबसे अधिक सहायक होती है कुंडली में बृहस्पति की शुभ स्थिति होने पर या बने हुए पाप योगों पर बृहस्पति की दृष्टि पड़ने पर बड़ी समस्याएं नहीं होती। (कुंडली में बालारिष्ट योग होने पर गंभीर संकट की स्थिति तभी बनती है जब लग्न लग्नेश चन्द्रमाँ सभी पीड़ित हों और वर्तमान दशाएं और गोचर भी विपरीत चल रहे हों)

बच्चे की कुंडली में बालारिष्ट योग होने पर करें ये उपाय -

1. ज्योतिषीय सलाह के बाद बच्चे को उसकी कुंडली के लग्नेश ग्रह का रत्न धारण कराएं।

2. बच्चे की कुंडली में बने नकारात्मक ग्रहयोगों के लिए नियमित दान करते रहें।

3. बच्चे को हनुमान चालीसा पढ़ने का नित्य अभ्यास कराएं।

4. माता-पिता बच्चे के निमित्त नियमित रूप से महामृत्युंजय जाप करते रहें।

5. प्रतिवर्ष बच्चे के जन्मदिवस पर ब्राह्मण से घर में शांति हवन कराएं और गरीबों में अन्न वस्त्र दान करें इससे बच्चे के आयु बल विद्या और यश में वृद्धि होती है।

।। श्री हनुमते नमः।।

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