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 Article of the Month - Astroindusoot

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आपकी कुंडली में लग्न और लग्नेश ग्रह का विशेष महत्त्व

जन्म कुंडली के विश्लेषण में वैसे तो कुंडली के बारह भावों का अपना अलग अलग महत्व है पर कुंडली के लग्न या लग्न भाव को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। कुंडली के प्रथम भाव को लग्न कहकर संबोधित किया जाता है और लग्न भाव अर्थात कुंडली के प्रथम भाव में स्थित राशि का स्वामी लग्नेश कहलाता है। फलित ज्योतिष में लग्न भाव और लग्नेश की स्थिति को बड़ा ही महत्व पूर्ण माना गया है यहाँ तक की ज्योतिष के प्रसिद्ध ग्रन्थ "फलदीपिका" में तो बताया गया है के लग्न और लग्नेश में कुंडली की आधी शक्ति होती है लग्न और लग्नेश मजबूत होने से कुंडली बहुत बली हो जाती है तो लग्न और लग्नेश का कमजोर या पीड़ित होना कुंडली को कमजोर बनाकर व्यक्ति के जीवन में संघर्ष की अधिकता उत्पन्न करता है। ........

ज्योतिषीय नियमों के अनुसार कुंडली के लग्न भाव को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना गया है क्योंकि यह हमारे जीवन के बहुत महत्वपूर्ण घटकों का प्रतिनिधित्व करता हैं, कुंडली के लग्न भाव को शरीर बल, स्वास्थ,रोगप्रतिरोधक क्षमता, रूप, मष्तिष्क, आकृति, प्रकृति, स्वाभाव, आयु, आत्मा, आत्मविश्वास, सम्मान, प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा, यश, तेज़, आदि का कारक माना गया है कुंडली में लग्न और लग्नेश का बली स्थिति में होना जहाँ इन घटकों की अच्छी स्थिति प्रदान करता तो कमजोर लग्न और लग्नेश व्यक्ति को बहुत से उतारचढ़ाव और संघर्ष का सामना कराते हैं।

यदि कुंडली में लग्न शुभ ग्रहों से प्रभावित हो तथा लग्नेश केंद्र, त्रिकोण (1,4,7,10,5,9 भाव )आदि शुभ स्थानों में हो या स्व उच्च राशि में होकर बली हो तो ऐसे में व्यक्ति का स्वास्थ पक्ष अच्छा होता है, व्यक्ति आत्मविश्वास से परिपूर्ण होता है और लग्नेश के बलवान होने पर व्यक्ति को आचि सामाजिक प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि और यश की प्राप्ति होती है, लग्नेश बली और शुभ स्थिति में होने पर व्यक्ति के मुख पर तेज (ग्लो) उत्पन्न होता है और व्यक्ति के हाव भाव और व्यक्तित्व आकर्षक होते हैं। जिन व्यक्तियों की कुंडली में लग्नेश लग्न में ही स्थित हो या लग्नेश की लग्न पर दृष्टि पड़ती हो ऐसे व्यक्ति बहुत प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा पाने वाला अपने क्षेत्र में जाना माना व्यक्ति होता है। यदि कुंडली में लग्नेश बलि स्थिति में होकर केंद्र में हो और पाप प्रभाव से मुक्त हो तो ऐसा केंद्र में बैठा बली लग्नेश बहुत समृद्धि और उन्नति दयाक माना गया है कुंडली में लग्नेश का मजबूत होना केवल स्वास्थ या प्रसिद्धि ही नहीं देता बल्कि जीवन के पूर्ण विकास और उन्नति में बहुत सहायक होता है। यदि कुंडली में लग्नेश शुभ भावों में हो या स्व उच्च राशि में होकर बली स्थिति में हो तो ऐसे में लग्नेश ग्रह की दशा बहुत शुभ फल करने वाली होती है तथा शुभ और बली लग्नेश की दशा में व्यक्ति को अच्छा स्वास्थ, आत्मविश्वास, प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है तथा जीवन उन्नति और समृद्धि की और आगे बढ़ता है।
यदि कुंडली के लग्न भाव में पाप योग (गुरुचांडाल योग, ग्रहण योग आदि) बने हुए हों, लग्नेश दुःख भावों में हो, नीच राशि में हो या अन्य प्रकार से जब लग्नेश पीड़ित हो तो ऐसे में व्यक्ति के जीवन की अधिकता बढ़ जाती है, स्वास्थ समस्यायें अधिक होती हैं, व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी होती है तथा लग्न और लग्नेश के कमजोर होने पर व्यक्ति को प्रसिद्धि नहीं मिल पाती और किये गए अच्छे कार्यों का यश नहीं मिल पाता, भला करने पर भी भलाई नहीं मिलती। यदि कुंडली में लग्नेश विशेषकर छटे या आठवे भाव में हो तो ऐसे में शरीर की रोग प्रतरोधक क्षमता कम होती है ऐसे में व्यक्ति को स्वास्थ समस्यायें बहुत परेशान करती है और जल्दी जल्दी स्वास्थ में उतार चढाव आते हैं। लग्नेश का कुंडली के बारहवें भाव में होना भी जीवन में संघर्ष और अधिक परिश्रम को उत्पन्न करता है इसके अलावा लग्नेश का कुंडली तीसरे भाव में होना अधिक पुरुषार्थ कराता है पर विशेष रूप से त्रिक भाव (6,8,12) में लग्नेश का होना अधिक समस्या कारक होता है।

मेष और वृश्चिक लग्न में लग्नेश मंगल, वृष और तुला लग्न में शुक्र, मिथुन और कन्या लग्न में बुध, धनु और मीन लग्न में बृहस्पति, कर्क लग्न में लग्नेश चन्द्रमाँ, सिंह लग्न में सूर्य तथा मकर और कुम्भ लग्न में लग्नेश शनि होता है।
यदि यदि कुंडली के लग्न भाव में कोई पाप योग बन रहा हो तो उन पाप योग बनाने वाले ग्रहों का दान आदि करना चाहिए तथा लग्नेश कमजोर या पीड़ित होने पर उसे बली करने के लिए लग्नेश ग्रह के मन्त्र का जप करना लग्नेश को बल प्रदान करता है और किसी योग्य ज्योतिषी की सलाह से लग्नेश ग्रह का रत्न धारण करना भी कुंडली के लग्नेश को बल प्रदान करता है।

।। श्री हनुमते नमः।।

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