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देवगुरु बृहस्पति

ज्योतिष और ज्योतिषीय गणनाओं का आधार नवग्रह ही हैं हमारे जीवन के सभी घटकों को नवग्रह ही नियंत्रित करते हैं परन्तु ज्योतिष में "बृहस्पति" को एक विशेष स्थान प्राप्त है हमारे जीवन के महत्वपूर्ण घटकों पर तो बृहस्पति का अधिकार है ही साथ ही जीवन में होने वाली घटनाओं के समय निर्धारण में भी बृहस्पति ही अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है बृहस्पति को शुभ और सौम्य प्रवृति का ग्रह माना गया है धनु और मीन राशि पर बृहस्पति का अधिकार है अर्थात बृहस्पति धनु और मीन राशि का स्वामी है। बृहस्पति कर्क राशि में उच्च और मकर राशि में नीचस्थ होता है सूर्य, चन्द्रमाँ और मंगल बृहस्पति के मित्र ग्रह हैं।

बृहस्पति के कारकतत्व -

“ बृहस्पति को जीव(स्वम), अपने गुरु, ज्ञान, शिक्षा, विवेक, अध्यापन परिपकवता, विनम्रता, सच्चरित्रता, प्रबन्धशक्ति, संतान, संतान सुख, धर्म, धार्मिक कार्य, परामर्श, उपचार, समाधान शक्ति, कागज, संपादन, ब्याज आदि का कारक माना गया है इसके अतिरिक्त हमारे शरीर में लीवर, वसा(फैट) और श्रवण क्षमता को बृहस्पति ही नियंत्रित करता है"
यदि जन्मकुंडली में बृहस्पति मजबूत हो स्व,उच्च राशि में हो मित्र राशि में हो शुभ भाव ( केंद्र - त्रिकोण) में बैठा हो तो ऐसा व्यक्ति ज्ञानवान विवेकशील और परिपक्व स्वभाव का होता है ऐसे व्यक्ति में प्रबंधन की बहुत अच्छी कुशलता होती है मजबूत बृहस्पति वाले व्यक्ति में समस्याओं का समाधान ढूंढने की बहुत अच्छी समझ होती है। बृहस्पति यदि कुंडली में अच्छी स्थिति में हो और पाप प्रभाव में ना हो तो ऐसा व्यक्ति ईमानदार और आज्ञाकारी स्वाभाव का होता है बृहस्पति यदि अच्छी स्थिति में हो तो संतान अच्छी और आज्ञाकारी होती है। मजबूत बृहस्पति वाला व्यक्ति अपने ज्ञान और विद्याओं के कारण प्रसिद्धि प्राप्त करता है।

यदि कुंडली में बृहस्पति नीच राशि (मकर) में हो राहु से पीड़ित हो पाप भाव (6,8,12) में हो या अन्य किसी प्रकार पीड़ित हो तो ऐसे व्यक्ति को शिक्षा प्राप्ति में बहुत बाधायें आती हैं। परिपकवता और कॉमन सैंस की कमी होती है बृहस्पति पीड़ित होने पर व्यक्ति को संतान प्राप्ति और संतान सुख में समस्याएं रहती हैं बृहस्पति कमजोर या पाप प्रभाव में होने से व्यक्ति को धार्मिक कार्य करने में बहुत बाधायें आती हैं। यदि बृहस्पति नीच राशि में हो राहु से पीड़ित हो छटे, आठवें भाव में हो तो ऐसे में लीवर से जुडी समस्याएं बहुत परेशान करती हैं तथा श्रवण क्षमता से जुडी समस्याएं भी आती हैं

बृहस्पति ज्योतिषीय गणनाओं में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है बृहस्पति की दृष्टि को अमृत माना गया है अतः यदि कोई ग्रह या भाव कुंडली में कमजोर या पीड़ित हो और उस पर बृहस्पति की दृष्टि पड़ रही हो तो उस कमजोर ग्रह को बल मिल जाता है मजबूत बृहस्पति की दृष्टि जिस भाव पर हो उस भाव के फलों में भी शुभ वृद्धि होती है

बृहस्पति और करियर -

यदि कुंडली में बृहस्पति मजबूत स्थिति में और शुभ भावों में हो तो ऐसा व्यक्ति शिक्षा के क्षेत्र में सफल करियर बना सकता है अच्छा टीचर बन सकता है, मैनेजमेंट, संपादन, स्टेशनरी, धार्मिक कार्य, फाइनेंस, कागज से जुड़े कार्य, कंसल्टेंसी, ज्योतिष, गोल्ड, किताबों से जुड़ा काम और धार्मिक वस्तुओं के कार्य में सफलता मिलती है।

बृहस्पति से अन्य ग्रहों का योग -

बृहस्पति+सूर्य - बृहस्पति और सूर्य का योग बहुत शुभ होता है इसे जीवात्मा योग कहते हैं ऐसे व्यक्ति का व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली होता है और अच्छी सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है। धार्मिक कार्यों में रुचि होती है व्यक्ति में अच्छी सकारात्मक शक्ति होती है।

बृहस्पति+चन्द्रमाँ - कुंडली में बृहस्पति और चन्द्रमाँ का योग बहुत शुभफलकारी होता है इसे गज केशरी योग भी कहते हैं यह योग समृद्धि को बढाने वाला होता है। ऐसा व्यक्ति शांत चित्त और अपनी माता के प्रति विशेष लगाव रखने वाला होता है ।

बृहस्पति+मंगल - कुंडली में बृहस्पति मंगल का योग होने से व्यक्ति निडर और पराक्रमी स्वाभाव का होता है प्रतिस्पर्धा में आगे रहता है ऐसा व्यक्ति कुछ ईगोस्टिक भी होता है।

बृहस्पति+बुध - कुंडली में बुध बृहस्पति का योग होने पर जातक बहुत बुद्धिमान गहनता से सोचने वाला और दूरद्रष्टा होता है ऐसे व्यक्ति में बहुत अच्छी तर्क कुशलता होती है गणनात्मक कार्यो में आगे रहता है और अपने बुद्धि बल से सभी कार्यों को सिद्ध कर लेता है।

बृहस्पति+शुक्र - बृहस्पति शुक्र का योग शुभ भाव में बनना अच्छा होता है भाव के फलों को बढ़ता है ऐसे व्यक्ति में कलात्मक प्रतिभाएँ होती हैं और रचनात्मक कार्यों में ऐज बढ़ता है।

बृहस्पति+शनि - शनि और बृहस्पति का योग बहुत शुभ होता है यदि शुभ भाव में हो तो उच्च पद की प्राप्ति होती हैः करियर के लिए अच्छा फल होता है ऐसा व्यक्ति अपने कार्य को पूरी लगन के साथ करता है शनि और बृहस्पति का योग व्यक्ति में आध्यात्मिक प्रवृति को बढ़ाता है और गूढ़ ज्ञान की प्रप्ति कराता है।

बृहस्पति+राहु - बृहस्पति राहु का योग दुष्परिणाम देने वाला होता है इसे गुरु-चांडाल योग कहते हैं कुंडली में यह योग होने से व्यक्ति क्रोधित स्वभाव का होता है शिक्षा में बाधाएं आती हैं व्यक्ति की विवेक शक्ति क्षीण होती है जिस भाव में ये योग हो उस भाव की हानि करता है सन्तानसुख को बाधित करता है।

बृहस्पति+केतु - बृहस्पति केतु का योग व्यक्ति को मोक्ष कामी बनाकार आध्यात्मिक दृष्टिकोण देता है गूढ़ ज्ञान में रुचि होती है। शिक्षा और संतान पक्ष के लिए शुभ नहीं है।

।। श्री हनुमते नमः।।

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