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मकर संक्रांति से सूर्य होंगे उत्तरायण जानिए उत्तरायण का विशेष महत्त्व

हिन्दू पंचांग और वैदिक गणनाओं में सूर्य की दो विशेष स्थितियों के अनुसार वर्ष को छः छः महीने के दो भागों में बाटा गया है जिन्हे "अयन" कहते हैं, जिस समय सूर्य पृथ्वी के दक्षिणी गोलार्ध में होता है तो उसे "दक्षिणायन" और जब सूर्य की स्थिति पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में होती है तो इसे "उत्तरायण" कहते हैं। पौराणिक व्याख्यानों के अनुसार दक्षिणायन काल देवताओं की रात्रि और उत्तरायण काल देवताओं का दिन माना गया है इसीलिए दक्षिणायन को एक नकारात्मक समय और उत्तरायण को बहुत शुभ और सकारात्मक ऊर्जाओं के उदय वाला समय माना गया है। ज्योतीषीय गणना के हिसाब से हर वर्ष मकर संक्रांति के दिन से उत्तरायण की शुरुआत होती है, सूर्य के मकर राशि से मिथुन राशि तक के गोचरीय संचार में उत्तरायण होता है और कर्क राशि से धनु राशि तक के संचार में दक्षिणायन होता है… अंगेजी कैलेण्डर के हिसाब से मोटे तौर पर जनवरी से जून के बीच का समय सूर्य का उत्तरायणकाल होता है।
उत्तरायण का विशेष महत्त्व - उत्तरायण सूर्य को आध्यात्मिक सांसारिक और भौगोलिक सभी दृष्टियों से बहुत शुभ समय माना गया है इसीलिए जीवन के सभी शुभ मंगल कार्यों के लिए उत्तरायण सूर्य को ही श्रेष्ठ बताया गया है। उत्तरायण के समय सूर्य की सकारात्मक किरणे पृथ्वी पर पड़ती हैं जो जीवन संचालन और वनस्पतियों के लिए भी बहुत अच्छा होता है इसके अलावा दक्षिणायन के समय में वर्षा शरद और हेमंत ऋतु होने से वो समय प्राकृतिक उथल पुथल से भरा होता जब बारिश आँधी तूफ़ान आदि प्राकृतिक आपदाएं ज्यादा आती हैं और "चातुर्मास" का समय भी दक्षिणायन में ही पड़ता है जिस कारण विवाह आदि मंगल कार्य दक्षिणायन सूर्य में नहीं किये जाते पर सूर्य उत्तरायण होने पर शिशिर बसंत और ग्रीष्म की ऋतुए होती हैं जिनमे मौसम अच्छा और सुहावना होता है और सकारात्मक प्राकृतिक ऊर्जाएं भी अपने चरम पर होती हैं इसलिए उत्तरायण सूर्य में सभी शुभ मंगल कार्य करना श्रेष्ठ माना गया है। दक्षिणायन में दिन छोटे और रात लम्बी होती है पर सूर्य उत्तरायण होने पर दिन बड़े और रात छोटी होने लगती है जिससे दिन में समय का अच्छी प्रकार प्रयोग किया जा सकता है।

उत्तरायण का समयकाल धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से भी एक बहुत शुभ समय होता है सूर्य नारायण जगत की आत्मा हैं और उत्तरायण के समय उत्तरी गोलार्ध से सूर्य की शुभ रश्मियों का पृथ्वी पर पड़ना इस समय को दिव्य ऊर्जाओं से भर देता है इसीलिए जीवन के सभी संस्कार और मंगल कार्य जैसे मुण्डन, विवाह संस्कार, नीवपूजन, गृहप्रवेश आदि उत्तरायण सूर्य में करना बहुत शुभ परिणाम देने वाला होता है... उत्तरायण सूर्य की महिमा इतनी ज्यादा मानी गयी है के महाभारत काल में मृत्युशय्या पर पड़े हुए भीष्म पितामाह उत्तरायण की प्रतीक्षा में ही अपनी इच्छा मृत्यु को भी टालते रहे और सूर्य उत्तरायण होने पर ही उन्होंने अपने प्राण त्यागे .... गीता में भी इस बात का वर्णन आता है के उत्तरायण काल में निर्वाण होने से जीवात्मा की सभी सांसारिक बंधनो से मुक्ति हो जाती है।

।। श्री हनुमते नमः।।

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